इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर खुद को गंभीर रोगी मान रहे स्वस्थ लोग
जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. आरती यादव का खुलासा
स्किजोफ्रेनिया : “मैं भगवान हूँ, दूसरी दुनिया से आया हूँ”
कथनी_करनी_न्यूज
बाराबंकी। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में जहाँ जानकारियाँ आसानी से मिल रही हैं, वहीं अब यह लोगों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। बच्चो के मामलों में उनकी माँ भी जिम्मेदार है।
जिला अस्पताल के मनो कक्ष की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. आरती यादव ने कई चौंकाने वाले खुलासे करते हुए बताया कि अस्पताल आने वाले करीब 30 से 40 प्रतिशत मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें वास्तव में कोई शारीरिक बीमारी नहीं होती, बल्कि वे एक गंभीर मानसिक विकार से ग्रसित होते हैं। डॉ. आरती के अनुसार, लोग सोशल मीडिया पर बीमारियों के लक्षण सुनकर या पढ़कर खुद को भी उसी बीमारी का मरीज मान लेते हैं। चिकित्सा विज्ञान में इस बढ़ती हुई खतरनाक मानसिक स्थिति को ‘मानसिक सोमेटोफॉर्म’ (Somatoform Disorder) और बच्चों के संदर्भ में ‘मंचौसेन सिंड्रोम’ (Munchausen Syndrome) कहा जाता है। डॉ. आरती यादव ने बताया कि इस बीमारी से पीड़ित मरीज सालों-साल अलग-अलग डॉक्टरों के चक्कर काटते रहते हैं। वे बार-बार महंगी जाँचें (जैसे अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई) करवाते हैं और लगातार दवाइयां खाते हैं। सभी जाँच रिपोर्ट नॉर्मल आने के बावजूद उनका मन संतुष्ट नहीं होता और उन्हें हमेशा यह शंका बनी रहती है कि वे किसी जानलेवा बीमारी की चपेट में हैं। जब शारीरिक डॉक्टरों को कोई बीमारी नहीं मिलती, तब अंत में मरीजों को मनोचिकित्सक के पास रेफर किया जाता है।
माँ की सनक का शिकार बन रहे बच्चे
इस मामले में सबसे डरावना पहलू बच्चों से जुड़ा है। डॉ. आरती ने बताया कि ‘सोमेटोफॉर्म’ के लक्षण सबसे ज्यादा माताओं में देखे जा रहे हैं। जब कोई माँ इस मानसिक विकार की चपेट में आती है, तो वह अपने स्वस्थ बच्चे को भी गंभीर रूप से बीमार मानने लगती है। इस स्थिति को ‘मंचौसेन सिंड्रोम बाय प्रॉक्सी’ कहा जाता है। माँ अपनी इस शंका के कारण मासूम बच्चे को भी लगातार डॉक्टरों के पास ले जाती है, उसकी जबरन जाँचें करवाती है और बिना जरूरत के कड़वी दवाइयां खिलाती है। कुछ मामलों में झाड़फूक से जुड़े भी होते है, जिससे बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर बेहद बुरा असर पड़ता है।
“मैं भगवान हूँ, दूसरी दुनिया से आया हूँ”








