कृषको को मिलेगा ताइवान बॉबी खरबूजा बीज – राजितराम
विदेशी खरबूजे के बीज की डिमांड, कम्पनी के अधिकारी का जिला कृषि अधिकारी को आश्वासन
कथनी_करनी न्यूज़
बाराबंकी। जनपद में नो-न्यू सीड्स कम्पनी की ताइवान-बॉबी खरबूजा बीज की समस्या के दृष्टिगत जिला कृषि अधिकारी ने जनपद में बीज की उपलब्धता व किसानो को निर्धारित मूल्य पर बीज विक्रय के सम्बन्ध में सम्बन्धित कम्पनी के प्रतिनिधि एवं अधिकृत बीज विक्रेताओं संग समीक्षा बैठक की। बैठक में सम्बन्धित कम्पनी के स्टेट हेड ऑफिसर राजेश कुमार यादव, अधिकृत बीज विक्रेता के साथ-साथ जिला कृषि रक्षा अधिकारी भी बैठक में उपस्थित रहें।
जिला कृषि अधिकारी द्वारा कम्पनी प्रतिनिधि को जनपद में बीज की मांग के दृष्टिगत अधिक से अधिक मात्रा में बीज आपूर्ति हेतु निर्देशित किया। जिसके सम्बन्ध में कम्पनी के स्टेट हेड ऑफिसर राजेश कुमार यादव ने बताया कि बीते वर्ष में उत्तर प्रदेश में बॉबी प्रजाति का बीज मात्र 4 कुंतल ही भेजा गया था। इस वर्ष बाराबंकी के किसानो की मांग को देखते हुए 8 कुंतल बीज की बुकिंग की गयी है। जो बाराबंकी के किसानो की मांग का लगभग दोगुना है। जिससे कृषकों को किसी प्रकार से परेशान नहीं होना पड़ेगा। आगे बताया कि उनकी कम्पनी मुख्य रूप से पपीता, तरबूज, खरबूजा व सब्जियों के बीज का उत्पादन एवं विक्रय करती है। कम्पनी का रिसर्च एवं उत्पादन ताइवान में किया जाता है। भारत में बीज आने पर डीएनए टेस्ट, यूटी टेस्ट कम्पनी द्वारा कराया जाता है, उसके बाद अलग-अलग राज्यों को बीज आपूर्ति किया जाता है।
खरबूजा फसल की 3 मुख्य प्रजातियां
खरबूजा फसल की मुख्य तीन प्रजाति-बॉबी, मृदुला एवं मुस्कान की जनपद में कृषकों द्वारा बुवाई की जाती है, जिसमें बॉबी प्रजाति सबसे प्रचालित प्रजाति है, इसका जनपद में लगभग 1000 हे० क्षेत्रफल में कृषकों द्वारा खेती की जाती है, जो अन्य किस्मों के सापेक्ष अधिक टीएसएस होने के कारण सबसे मीठा प्रजाति में शुमार है। इसकी कीपिंग गुणवत्ता सबसे अधिक है। मृदुला प्रजाति दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा प्रचलित है, अत्यधिक उत्पादन देने के कारण इसकी खेती उत्तर भारत में भी प्रचलित हो रही है। बाराबंकी में इस प्रजाति का क्षेत्रफल लगभग 300 हे० है, इस प्रजाति के गूदा भी बॉबी प्रजाति की तरह सफेद होता है। मुस्कान-यह खुशबूदार प्रजाति है, यह अगेती किस्म की प्रजाति है, इसका गूदा हल्के हरे कलर का होता है। जनपद में इसकी लगभग 150 हे० क्षेत्रफल में खेती की जाती है।


